David Fincher is back.

For us film nerds, that phrase is more than enough to give our breathing a pause. Easily, one of the most choosy filmmakers of modern era, every time Mr. Fincher picks a story to tell, it confounds everyone — critics, audiences, fans & even students of…


New Normal has become a buzzword across the globe, especially in the wake of the pandemic. Across every level of social strata regardless of the economic status of any country — developed or developing — lives & livelihoods, thought processes & mental construct have been challenged like never before. Humankind…


Back in 2000, an innocuous little opening shot from an indie film sent the global community of cinephiles & film nerds into a collective gasp. You can watch that scene below.

The film, Memento. The director, Christopher Nolan. Little did anyone know that this director, over a period of…


Critics are obsessed, especially in Hollywood, with comparing Joker (2019) against Stanley Kubrick’s relentless masterpiece A Clockwork Orange.

This piece is dedicated to underscoring why the obsession itself is misplaced, daft and born out of a serious pretence of intellect in such dilapidated post-modern times!

Any film that masquerades itself…


Todd Phillips has crafted a terrifying, haunting, slow-burning psychological study of a deranged man, an unreliable narrator, and a man who holds a mirror to the highly sensitive world that we have come to inhabit.

There’s a thing that makes every celluloid adaptation of DC Comics’ legendary antagonist a provocative…


शाख पे बैठे हुए एक पत्ते की तरह

हवा के झोंके का इंतज़ार करते हुए

ज़िन्दगी कुछ इस तरह गुज़र रही है जैसे

कोई आस ही न रह गयी हो

कभी धुप, कभी छाओं की अत्थ्खेलियों में

अपने वजूद की तलाश में

इधर उधर बे-मकसद उड़ते हुए

ज़िन्दगी कुछ इस तरह गुज़र रही है जैसे

आस का एक पंची बना

खुली हवा को सिर्फ नज़रों से देखता

पिंजरे में बंद एक पंच्छी जैसा मैं

ज़िन्दगी बस गुज़र रही है ऐसे…


मैं और मय की खुशबु जब भी मेरे करीब आती

मैं और मय की खुशबु जब भी मेरे करीब आती

उम्मीदों की एक सुगबुगाहट जगा जाती

कुछ घटता बाहर ऐसा

जिसके संबोधन में आने की मेरी एक ख्वाहिश ही रह जाती

किताबों के सफों के बीच उम्मीदों को दफना के जी रहा था मैं ऐसा

की न मैं न मय

ज़िन्दगी यूँ होती की कोई हसरत ही ना रह जाती


छवि अपनी ढूँढने चला मैं

खड़ा था दर्पण के सामने

जो दिखा वोह नकारते हुए

चला मैं किसी और की खोज में

क्या सच था जो देखा मैंने?

या थी वोह किसी की कल्पना?

ये अब तक जुटाने की कोशिश में मैं

धूमिल थी वोह छवि संवेदना की पीड़ा में

क्या कभी उभर भी पाऊंगा मैं इस वेदना से?

की क्या सच है और क्या कल्पना मेरी इस छवि में?

कहीं मैं ही धूमिल न हो जाऊं इस चक्रव्यूह में.


रातें अलग थीं

अलग थीं वोह शामें

अहसास अलग था

अलग थीं वोह गुफ्तुगुएं

था मैं अलग या

अलग था वोह समा

उन एहसासों और उन हक़ीक़तों

के दरमियान क्या हुआ ऐसा

क्या बदला ऐसा जिसकी तलाश में

आज तक हैरान हूँ मैं

कभी ताज्जुब होता है

कभी बदहवासी भी

मैं अलग था या मैं अलग हूँ

मेरे इन दो अलगपनों में ऐसा क्या अलग था


तखरीरें, तसवीरें और तस्सवुर

क्या कभी सफों से उभर भी पायेंगे?

जलसों और महफिलों में ज़िक्र हुआ जिनका

वोह लफ्स क्या कभी जिंदा भी हो पायेंगे?

जो शमा उन महफिलों को रोशन करती थी

क्या वोह कभी अंगार बनेगी भी?

वोह कौन सा है सुरूर, वोह कौन सा है नशा

वोह कौन सी है नींद जिसकी चादर ओढ़े यह समा सोया हुआ है?

अगर सुकून की है यह नींद तोह यह सुकून क्या है?

इस सुकून का मुझे हासिल क्यों नहीं?

सोचता हूँ मैं अक्सर की सोचता हूँ क्यों मैं

जब यह समा ही बेहोश सा इस सुरूर में डूबा

सुकून की नींद सोता है

अगर इस सुकून की ही तलाश में है मेरा दिमाग

तोह क्यों ना मैं भी चख लूं इस नशे को

और खो जाऊं इन लफ्सों, इन जलसों, इन शमाओं के परे…

Ramanathan Iyer

seeker, deconstructionist, raconteur

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